SAVE ARAVALI HILLS | अरावली का अस्तित्व | Aravali

अरावली का अस्तित्व: हमारी विरासत और भविष्य की जंग

​अरावली की पहाड़ियाँ सिर्फ पत्थर के ऊंचे ढेर नहीं हैं, बल्कि ये उत्तर भारत की वह ‘रक्षा दीवार’ हैं जो सदियों से हमें थार मरुस्थल की तपती रेत और धूल भरी आँधियों से बचाती आई हैं। गुजरात से लेकर दिल्ली तक फैली ये दुनिया की सबसे पुरानी पर्वत श्रृंखलाओं में से एक हैं। लेकिन आज विडंबना यह है कि जो पहाड़ियाँ हमें जीवन देती हैं, वे खुद अपने अस्तित्व की अंतिम लड़ाई लड़ रही हैं।

​संकट की आहट

​पिछले कुछ दशकों में विकास के नाम पर अरावली का सीना छलनी किया गया है। अवैध खनन, पहाड़ों को काटकर बनाई जा रही आलीशान सोसायटियां और बड़े पैमाने पर जंगलों की कटाई ने इस पारिस्थितिकी तंत्र को तबाह कर दिया है। इसका सीधा असर अब दिखने लगा है—हरियाणा और दिल्ली में गिरता भूजल स्तर, साल-दर-साल बढ़ती गर्मी और बिगड़ती हवा की गुणवत्ता। अरावली वह ‘फेफड़ा’ है जो दिल्ली-एनसीआर की जहरीली हवा को साफ करने का दम रखता है, लेकिन अगर फेफड़े ही नहीं रहेंगे, तो हम सांस कैसे लेंगे?

​जन-आंदोलन की गूँज

​जब सरकारी तंत्र और कानून की ढिलाई के कारण पहाड़ गायब होने लगे, तब आम जनता और पर्यावरण प्रेमियों ने मोर्चा संभाला। ‘सेव अरावली’ (Save Aravali) जैसे आंदोलनों की शुरुआत हुई। यह केवल पर्यावरणविदों का आंदोलन नहीं है, बल्कि इसमें छात्र, बुजुर्ग, किसान और शहर में रहने वाले नौकरीपेशा लोग भी शामिल हैं।

​इस आंदोलन की सबसे बड़ी ताकत इसकी ज़मीनी सक्रियता है। लोग रविवार की सुबह जंगलों में पैदल मार्च निकालते हैं, पौधारोपण करते हैं और सोशल मीडिया के जरिए सरकार पर दबाव बनाते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने भी इस मामले में कई बार कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा है कि ‘अगर पहाड़ खत्म हो गए, तो हम भविष्य की पीढ़ी को क्या जवाब देंगे?’ कोर्ट के आदेशों ने इस आंदोलन को कानूनी बल दिया है, जिससे कई अवैध निर्माणों पर बुलडोजर चला है।

​हमारी जिम्मेदारी

​अरावली को बचाना सिर्फ पेड़ों को बचाना नहीं है, बल्कि अपने जल स्रोतों और वन्यजीवों (जैसे तेंदुए, नीलगाय और पक्षियों) को बचाना है। यदि अरावली खत्म हुई, तो रेगिस्तान को दिल्ली और हरियाणा के उपजाऊ मैदानों तक पहुँचने से कोई नहीं रोक पाएगा।

​सरकार को चाहिए कि वह अरावली को पूरी तरह से ‘नो कंस्ट्रक्शन ज़ोन’ घोषित करे और इको-सेंसिटिव जोन के नियमों को सख्ती से लागू करे। लेकिन बदलाव सिर्फ कानूनों से नहीं आता; हमें अपनी जीवनशैली और सोच को भी बदलना होगा। अरावली का संरक्षण कोई उपकार नहीं, बल्कि हमारी खुद की उत्तरजीविता (survival) का सवाल है।

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